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भारत में तगड़े मुनाफे वाले कृषि व्यवसाय | India’s Most Profitable Agriculture Business Idea

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Most Profitable Agriculture Business Idea: दुनिया भर की विविधता से भरपूर हमारा देश भारत! जो कि एक कृषि प्रधान देश है, जहां विकसित होने की अपार संभावनाए हमेशा बनी ही रहती है. मौजूदा समय में भारत की लगभग 60% आबादी आज भी कृषि से ही अपना जीवन निर्वाह करती है. पुरातन काल से ही भारत में पारंपरिक तौर तरीकों से कृषि की जा रही है.

लेकिन लगातार बढ़ती आबादी और बेरोजगारी के कारण अब कृषि के उन पहलुओं पर गौर देना आवश्यक हो चुका है, जिससे किसान अपनी कृषि योग्यता में इजाफा कर पायें. साथ ही अपने द्वारा तैयार की गई फसल को उसके सही मुकाम पर पहुंचाकर अपनी मेहनत के अच्छे दाम भी निकाल पाएं.

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भारत की तुलना में ईरान बहुत ही छोटा देश है, फिर भी ईरान की कृषि विश्व विख्यात है जबकि भारत की नहीं. इसका सीधा मतलब यह है कि बदलते समय के साथ खुद को बदलना जरूरी है, मतलब खुद को परिस्थिति अनुसार ढालना जरूरी है. यह प्रकृति के कठोर नियमों में से भी एक है कि- “परिवर्तन ही जीवन है”.

आज इस पोस्ट के जरिये हम बात करने वाले हैं, भारत में तगड़े मुनाफे वाले कृषि आधारित व्यवसायों (Most Profitable Agriculture Business Idea) की, जिनको अपनाकर कोई भी किसान पारंपरिक कृषि की तुलना में बहुत ही तगड़ा मुनाफा बहुत ही आसानी से कमा सकता है.

नोट- (हमारा उद्देश्य यह बिल्कुल नहीं है कि किसान अपनी पारंपरिक कृषि को छोड़ दें, बल्कि पारंपरिक कृषि में सुधार कर आधुनिक तकनीकों से यदि कृषि की जाए तो लागत भी कम लगेगी और मुनाफा भी अच्छा मिलेगा)

Most Profitable Agriculture Business Idea: केसर की खेती (Saffron farming)-

जी हां! आपने बिल्कुल सही समझा. केसर का इस्तेमाल मसाले व कॉस्मेटिक उत्पाद निर्माण के तौर पर किया जाता है. भारत में केसर की खेती पारंपरिक तौर पर कश्मीर में ही होती है, ऐसा इसलिए क्योंकि केसर की खेती को एक निर्धारित तापमान व जलवायु की आवश्यकता होती है. मौजूदा बाजार में केसर का मूल्य 03 से लेकर 4.5 लाख रूपये प्रति किलोग्राम देखने को मिलता है.

भारत में केसर की खेती 02 तरीकों से की जाती है-

  1. पारंपरिक खेती (Traditional saffron cultivation)
  2. एरोपोनिक तकनीक से उर्ध्वाधर केसर की खेती (vertical saffron farming)

पारंपरिक तरीके से केसर की खेती करने के लिए वांछित मौसम की निर्भरता की आवश्यकता होती है, जबकि आधुनिक तकनीक “एरोपोनिक तकनीक से केसर की खेती” करना काफी सरल और सीमित स्थान पर की जाने वाली प्रक्रिया है.

एरोपोनिक तकनीक से केसर की खेती एक छोटे से कमरे में भी करना संभव है. साथ ही आधुनिक तकनीक में पारंपरिक खेती की अपेक्षा लागत भी कम आती है और मुनाफा भी अधिक होता है. यदि आप आधुनिक तकनीक से केसर की उर्ध्वाधर खेती (Vertical Saffron Farming) करने के इच्छुक हैं तो इस लेख को जरूर पढ़ें- “Agriculture business idea एरोपोनिक तकनीक से केसर की खेती

लागत और मुनाफा-

vertical saffron farming की पहले साल लागत लगभग 07 लाख रूपये और मुनाफा लगभग 2.50 लाख रूपये तक. दूसरे साल लागत लगभग 30 से 50 हजार रूपये और मुनाफा 2.50 से 05 लाख रूपये तक संभावित होता है.

नोट- व्यवसाय आधारित कृषि करने के इच्छुक किसानों व उद्यमियों को अपने व्यवसाय का पंजीकरण कराना अनिवार्य है. यह पंजीकरण सम्बंधित व्यवसाय के FSSAI, MSMEGST आदि अन्य अलग-अलग हो सकते है.

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मशरूम की खेती (Mushroom Farming: Agriculture business idea)-

पिछले कई वर्षों में किसानों का मशरूम उगाने का चलन तेजी से बढ़ चुका है, मशरूम उगाने का व्यवसाय या मशरूम की खेती करना इच्छुक उद्यमी अथवा किसान के लिए एक अच्छी आय का जरिया बन चुका है. सीमित स्थान, समय व कम लागत लगाकर की जाने वाली मशरूम की खेती परिणाम में एक अच्छा मुनाफा देती है.

भारत के कई राज्यों में मशरूम की खेती करने वाले किसान मशरूम की खेती से बहुत ही तगड़ा मुनाफा आसानी से ले रहे हैं. मशरूम की खेती का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए इच्छुक उद्यमी अथवा किसान भारत के किसी भी कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र में ले सकता है.

भारत में सफेद बटन मशरूम, ढींगरी (ऑयस्टर) मशरूम, दूधिया मशरूम, पैडीस्ट्रा मशरूम व शिटाके मशरूम की खपत बहुत बड़ी मात्रा में की जाती है. अत: इन किस्मों में से किसी भी मशरूम किस्म की खेती अपना कर अच्छा मुनाफे की शुरुआत की जा सकती है.

मशरूम की खेती मूलरूप से एक कृषि आधारित व्यवसाय (agriculture business idea) है, जिसे अपनाने से भारत के किसान अथवा अन्य इच्छुक उद्यमी अपने सफल भविष्य को एक सही राह दे सकते हैं.

लागत और मुनाफा-

Mushroom farming में प्रति वर्ष लागत लगभग 30,000 रूपये और मुनाफा तक़रीबन 70 हजार से 1.25 लाख रूपये (एक साल में 03 हार्वेस्टिंग) तक संभावित है.

मशरूम के मांग क्यों बढ़ रही है?

लगभग हर प्रकार के मशरूम में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण और विटामिन जैसे उच्च स्तरीय खाद्य पोषक तत्वों का समावेश होता है, जिस कारण मशरूम भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपना एक विशेष महत्व रखता है.

और वैसे भी आज की भागती लाइफ में पोषक तत्वों से भरे भोजन की मांग बहुत अधिक है, बशर्ते उसका मूल्य सभी जनमानस के अनुकूल हो. मौजूदा बाजार में मशरूम का मूल्य सभी के अनुकूल ही देखने को मिलता है, और लगभग सभी को मशरूम खाना भी पसंद है.

रागी की खेती (agriculture business idea: Ragi Cultivation)-

फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, आयरन, मैग्नीज, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटेशियम, राइबोफ्लेविन, ज़िंक, कैल्शियम व अन्य कई पोषक तत्वों से भरपूर रागी भारत का एक सुपर फूड है. भारत में रागी को मोटे अनाज के तौर पर उपयोग लिया जाता है.

एशिया और अफ्रीका महाद्वीप में रागी की खेती मुख्य रूप से की जाती है. रागी को “मडुआ, अफ्रीकन रागी, फिंगर बाजरा, कोदई” एवं “लाल बाजरा” के नाम से भी जाना जाता है. रागी की खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है रागी के पौधे पूरे साल पैदावार देने में सक्षम होते हैं. साथ ही रागी की खेती सह-फसली खेती को भी समर्थन देती है.

आपने मल्टीग्रेन आटे का नाम तो सुना ही होगा, मौजूदा समय में साधारण आटा (केवल गेहूं का) पर्याप्त पोषण हांसिल करने के लिए सक्षम नहीं समझा जाता है. जिस कारण मल्टीग्रेन आटे के प्रचार प्रभावी होते जा रहे हैं.

मल्टीग्रेन आटा तैयार करने के लिए कई तरह के इंग्रीडियंट/खाद्य सामग्रियों की आवश्यकता होती है, जिसमें सबसे पहला स्थान रागी अथवा रागी के आटे का होता है. रागी का उत्पादन करने वाले किसानो को कभी भी रागी की बिक्री में समस्या नहीं आती, क्योंकि रागी की मांग अधिक है, जबकि उत्पादन काफी सीमित होता है.

व्यवसायिक तौर पर रागी की बिक्री कहां सबसे अधिक होती है?

व्यवसायिक तौर पर अमूमन रागी की खरीद बड़ी आटा मिलों में की जाती है. इसके अलावा यदि इच्छुक किसान स्वयं बिक्री कर अच्छा मुनाफा बनाना चाहता है, तो ऑनलाइन e-commerce वेबसाइट सबसे कारगर विकल्प है.

जट्रोफा/रतनजोत की खेती (Bio fuel Farming)-

रतनजोत की खेती- जैव/बायोईंधन उत्पादन (bio fuel), औषधि निर्माण, जैविक खाद निर्माण, प्राकृतिक रंग बनाने के अलावा रतनजोत का पौधा मिट्टी सुधार (बंजर मिट्टी को उपजाऊ बनाने), मिट्टी के कटाव को रोकने व खेत की बाड़ बनाने जैसी उपयोगी अवसरों में वृद्धि के लिए उपयोगी होती है. 

रतनजोत को भारत में जंगली अरंड, व्याध्र अरंड, अरंडी, चन्द्रजोत जमालगोटा एवं वानस्पतिक नाम जट्रोफा करकस के नाम से जाना जाता है. रतनजोत का पौधा ऊपर से लेकर नीचे जड़ तक पूरी तरह से एक औषधि होता है.

इसके पत्ते को शरीर पर उभरी सूजन पर लागने से जल्द ही आराम मिल जाता है. साथ ही जट्रोफा का तेल (Castor oil) का उपयोग अनेक प्रकार की औषधि निर्माण में भी किया जाता है.

हम जानते हैं कि प्रकृति के संसाधन सीमित हैं और लगातार घट रहे हैं, ऐसे में जट्रोफा के पौधे से प्राप्त होने वाले तेल से हम हमारी ईंधन की समस्या को काफी हद तक निजात पा सकते हैं. अरंड का तेल जो कि उच्च गुणवत्ता का होने के साथ, गैर विषैला, कम धुँआ उत्पन्न करने वाला होता है, पूरी तरह से यह पेट्रो-डीजल जैसे बायोडीजल का स्रोत है.

रतनजोत की खेती पूरी तरह से नकदी फसल है. रतनजोत के पौधे जहां एक तरफ मिट्टी की उर्वरा बढ़ाने का काम करती है, वहीं दूसरी ओर इसके पौधे से मिलने वाले अनेक लाभ हैं. रतनजोत का पौधा रोपने के बाद तीसरे साल से उत्पादन शुरू करता है.

साथ ही एक बार पौधा लगाने के बाद रतनजोत का पौधा आने वाले 50 से 60 सालों तक चलता है. साथ ही इसकी खेती में ज्यादा लागत भी नहीं आती है.

मुनाफे की दृष्टी से आंकलन करने पर बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि रतनजोत की खेती, कृषि आधारित सबसे कारगर व्यवसाय विकल्प है. जिसमें घाटा न के बराबर ही होता है. मुनाफे की बात की जाए तो साल दर साल उत्पादन बढ़ने से मुनाफा भी बढ़ता जाता है.  

रतनजोत का पौधा उगाने की प्रक्रिया क्या है?

रतनजोत के पौधे को 02 तरीकों से बहुत ही सरलता से उगाया जा सकता है-
1. बीज द्वारा
2. कलम द्वारा

मल्टी लेयर फार्मिंग (Most profitable agriculture business idea: Multi layer Farming)-

परंपरागत खेती से कई गुना मुनाफा कमाने के लिए मल्टी लेयर फार्मिंग सबसे कारगर विकल्प है. मल्टी लेयर फार्मिंग (Multi layer Farming) जिसे सह-फसली खेती (Co-cropped farming) अथवा मिश्रित खेती (Mixed farming) से जाना जाता है.  मल्टी लेयर फार्मिंग कम से कम 02 फसलों का चुनाव कर शुरू की जा सकती है.

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मल्टी लेयर फार्मिंग को अपनाने से किसान अपने खेतों की उर्वरक शक्ति में लगातार बढ़ोत्तरी कर सकते हैं. मल्टी लेयर फार्मिंग में जहां एक तरफ फसल प्रबंधन व जल बचत में राहत मिलती है, वहीं दूसरी ओर फसल उत्पादन भी तगड़ा होता है.

मौजूदा समय में भारत के कई राज्यों में मल्टी लेयर फार्मिंग छोटे स्तर पर हो रही है. जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ रही कई किसानों ने इस आधुनिक कृषि को अपनाने में रूचि लेना शुरू कर दिया है.

मल्टी लेयर फार्मिंग अपनाने के लिए क्या करना जरूरी होता है?

किसी भी इच्छुक किसान को मल्टी लेयर फार्मिंग को अपनाने से पहले भारत के किसी भी कृषि विश्विद्यालय अथवा किसी कृषि विशेषज्ञ से मल्टी लेयर फार्मिंग की आवश्यक/सम्पूर्ण जानकारी लेना जरूरी है. बिना विस्तृत जानकारी के अभाव में कठिनाई अथवा नुकसान होना संभावित है.

मल्टीलेयर फार्मिंग में अमूमन फसलों का चयन कैसे किया जाता है?

मल्टीलेयर फार्मिंग में अमूमन कंदमूल, मझोली फसलों के साथ उंची पौधे वाली फसलों का चयन किया जाता है. मसलन- अदरक जो एक कंद फसल है के साथ साग जैसे पालक, बथुआ, चौराई व मिर्च जैसी मझोली फसल तथा पपीता, सहजन उंचे पौधे वाली फसल का चुनाव किया जा सकता है.

बायोफ्लॉक मछली पालन (Biofloc Fish Farming)-

मछली पालन व्यवसाय जो कि पूरी तरह से कृषि आधारित व्यवसाय (agriculture business idea) है, किसानों की आय बढ़ाने के लिए  शानदार विकल्प साबित हो चुका है. लेकिन अपर्याप्त जागरूकता के कारण अधिकतर किसानों को लगता है कि मछली पालन करने के लिए उनके पाद एक बड़े तालाब का होना बहुत जरूरी है.

परन्तु यह पूरी तरह से सही नहीं है. हालांकि अधिकतर छोटे किसानों के पास वांछित आकार के तालाबों की उपलब्धता न होने के कारण उनका मछली पालन अथवा मछली की खेती करने का ख्वाब, ख्वाब ही रह जाता है.

ऐसे में इच्छुक किसान यदि बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन अथवा मछली की खेती को अपनाता है तो परिणाम में वह पारंपरिक तरीके से की जा रही मछली की खेती के बराबर मुनाफा बड़ी ही आसानी से कमा सकता है. तो प्रश्न उठता है कि-

बायोफ्लॉक तकनीक क्या होती है?

बायोफ्लॉक तकनीक सीमित स्थान पर कृत्रिम जलाशय (pond) बनाकर मछली पालन से सम्बंधित सभी जरूरी सामग्रियों जैसे- pond/टैंक तैयार करने के लिए तारपोलिन, ऑक्सीजन के लिए एयरेशन सिस्टम, मछली चारा व मछली बीज/बच्चे की आवश्यकता होती है.

बायोफ्लॉक टैंक में कौन सी मछलियों का पालन किया जाता है?

अमूमन बायोफ्लॉक मछली पालन में उन मछलियों का चुनाव किया जाता है, जिनकी मौजूदा मार्केट में डिमांड होती है. वैसे बायोफ्लॉक टैंक में लगभग हर प्रकार की मछली का पालन आसानी से किया जा सकता है.

लागत और मुनाफा-

biofloc fish farming का एक टैंक सेटअप स्थापित करने की लागत (पहले साल की) लगभग 1.25 लाख रूपये तथा मुनाफा लगभग 90 हजार से 01 लाख रूपये. वही दूसरे साल में लागत मात्र 30 से 50 हजार और मुनाफा, 90 से 1.25 लाख रूपये तक संभावित है.

भारत की लगभग 65% आबादी मछली का सेवन करना पसंद करती है, और बायोफ्लॉक टैंक में तैयार की गई मछली हमेशा ही उच्च गुणवत्ता की मानी जाती है. बढ़ती बेरोजगारी के कारण अधिकतर युवा भी मछली पालन के व्यवसाय में रूचि लेते हैं.

बायोफ्लॉक मछली पालन व्यवसाय पर आने वाली लागत की भरपाई पहली हार्वेस्टिंग में लगभग-लगभग हो जाती है. मछली पालन व्यवसाय से और मुनाफा कमाने के लिए इच्छुक उद्यमी मछली बीज बिक्री, मछली पालन की जानकारी प्रदान करना व मछली चारा बनाने जैसे उद्यमों को भी अपना सकता है.

केकड़ा पालन व्यवसाय (Crab farming is India’s most profitable agriculture business idea)-

मौजूदा समय में जायदातर किसान बकरी पालन, मुर्गी पालन, पशुपालन अथवा मछली पालन व्यवसाय से प्रेरित देखने को मिलते हैं. लेकिन इन सब विकल्पों के अलावा भी एक ऐसा व्यवसाय भी है, जिसकी मांग बहुत ज्यादा है लेकिन पूर्ती बहुत कम, और यह व्यवसाय है केकड़ा पालन व्यवसाय.

केकड़ा पालन व्यवसाय (crab farming) अथवा केकड़े की खेती (kekde ki kheti) भारत में most profitable agriculture business idea है, जिसे अपनाकर प्रत्येक इच्छुक किसान परिणाम में बहुत ही तगड़ा मुनाफा कमा सकता है.

पिछले कई सालों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में केकड़े की मांग लगातार बढ़ी है, जो वर्तमान में बढ़ती जा रही है. ऐसे में उच्च गुणवत्ता की पूर्ती करने के लिए भारत सहित कई एशियाई देशों में नई-नई कृषि विधियों/तकनीकीयों का विकास होना शुरू हो चुका है.

हालांकि भारत में व्यवसायिक तौर पर केकड़े की खेती अभी ज्यादातर कृत्रिम तालाब (केकड़े के अनुकूल) बनाकर ही की जा रही है, जबकि अन्य एशियाई देशों में vertical crab farming का चलन जोर पकड़ चुका है.

लगातार बढ़ रही जनसँख्या के कारण आज हमें ऐसे-ऐसे पोषणाहार के स्रोत खोजने पड़ रहे हैं, जिनसे हम हमारे शरीर को निरोगी एवं तंदरुस्त बना पायें, विश्व की एक बड़ी आबादी आज Seafood (जलीय भोजन) पर निर्भर है. ऐसे में इच्छुक किसान द्वारा केकड़ा पालन व्यवसाय अपनाना एक सकारात्मक विकल्प है.

लागत और मुनाफा-

तालाब में crab farming का सेटअप स्थापित करने की लागत (पहले साल की) लगभग 01 लाख रूपये तथा मुनाफा लगभग 90 हजार से 01 लाख रूपये. वही दूसरे साल में लागत मात्र 30 से 50 हजार और मुनाफा 1.25 लाख रूपये तक संभावित है.

vertical crab farming क्या होती है?

vertical crab farming में एक बॉक्स में एक ही केकड़े का पालन किया जाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि केकड़ों में वर्चस्व की लड़ाई एक सामान्य बात है. vertical crab farming पूरी तरह से प्राकृतिक खेती मानी जाती है. इसे सीमित स्थान व उच्च गुणवत्ता के उत्पादन के लिए विकसित किया गया है.

केकड़े का भोजन क्या होता है?

केकड़ा मूलरूप से मांसाहारी होता है, इसलिए केकड़े के भोजन में मछली, लार्वा व अन्य तरह के मांसाहार की आवश्यकता होती है.

केकड़े की बिक्री कैसे होती है?

व्यवसायिक स्तर पर जीवित केकड़े की ही बिक्री की जाती है. मरे हुए केकड़े की कोई कीमत नहीं होती.

हाइब्रिड सेब की खेती (HRMN 99 Apple Cultivation)-

किसानों के आर्थिक पक्ष में सुधारने लाने के लिए हाइब्रिड सेब की खेती महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. मौजूदा बाजार के आंकलन के आधार पर हम जानते हैं कि उच्च गुणवत्ता के सेब की मांग, बाजार में साल भर दृणता से बनी ही रहती है. अमूमन बीते कई दशको में समझा जाता था कि सेब की खेती केवल ठंडे प्रदेशों में अधिक सफल मानी जाती थी, जो कि काफी हद तक सही बात है.

लेकिन अभी हाल ही में सेब की एक नई हाइब्रिड किस्म का विकास किया जा चुका है, यह हाइब्रिड किस्म गर्म जलवायु में बहुत अच्छे से पनपती है और साथ ही अच्छे उत्पादन की पैदावार भी करती है. इस नई किस्म को विकसित करने के श्रेय भारत के किसान श्री हरिमन शर्मा, निवासी- पनियाला, विलासपुर, हिमांचल प्रदेश द्वारा की गई है.

श्री हरिमन शर्मा जी के नाम पर इस नई हाइब्रिड किस्म का नाम “हरमन 99 (HRMN 99)” रखा गया है. HRMN 99 पूरी तरह से सेब की हाइब्रिड किस्म है, यह 45oC के तापमान में फसल उत्पादन करने में सक्षम है. भारत के कई राज्यों में हाइब्रिड सेब की खेती सफलतापूर्वक की जा रही है.

कृषि आधारित सफल व्यवसायों (agriculture business idea) की अगर बात की जाए तो HRMN 99, हाइब्रिड सेब की खेती सबसे कारगर विकल्प साबित हो चुका है. यदि इच्छुक किसान अपने निवेश से लम्बे समय तक मुनाफा कमाना चाहता है तो मेरे सुझाव है की HRMN 99 हाइब्रिड सेब की खेती को जरूर अपनाये.

HRMN 99 का पौधा कितने दिनों में फल देने लगता है?

रोपने के लगभग 02 साल बाद HRMN 99 का पौधा फल देने में सक्षम हो जाता है. हरियाणा, राजस्थान में परीक्षण के लिए लगाये गए पौधों ने लगभग 01 साल बाद ही फल उत्पादन करना शुरू कर दिया है.

हरमन 99 का पौधा कहां से खरीदें?

इंटरनेट पर भ्रामक मार्केटिंग के कारण आज किसानो को कई प्रकार के नुकसान उठाने पड़ते हैं. आज कई ढेर सारे ऑनलाइन स्टोर बन चुके हैं जो प्रमाणिक हरमन 99 उपलब्ध कराने का दावा करते हैं.  लेकिन यह सही नहीं है. यदि आपको प्रमाणिक हरमन 99 की खरीद करनी है तो आप सीधा श्री हरिमन शर्मा से संपर्क कर सकते हैं.

अंत में-

भारत की कृषि में संभावनाओं की कोई कमी नहीं है, हालांकि आज किसानों में आधुनिक कृषि के प्रति जागरूकता पहले की अपेक्षा कुछ हद तक बढ़ी है लेकिन पर्याप्त जानकारी न होने के कारण कई किसान जोखिम के भय से आधुनिक खेती को अपनाने से कतराते है.

खैर… आने वाला समय कुछ ऐसा होने वाला है, जहां यदि आप अपनी कृषि योग्यताओं में इजाफा नहीं करते हैं तो आपको अपनी कृषि से मुनाफा नाम मात्र ही मिल सकेगा, जिससे हताशा के अलावा और कुछ हांसिल नहीं होने वाला.

हमारा उद्देश्य सभी इच्छुक उद्यमियों, किसानों और खेती/कृषि प्रेमियों को बेहतर से बेहतर जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे अपनी कृषि योग्यताओं को बेहतर से बेहतरीन बना सके और कृषि आधारित व्यवसाय को अपनाकर अच्छा मुनाफा/लाभ भी उठा सकें.

आशा है आपको इस लेख “भारत में तगड़े मुनाफे वाले कृषि व्यवसाय (India’s most profitable agriculture business idea) से खेती/कृषि आधारित व्यवसायों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जरूर मिली होगी, साथ ही… यदि कुछ छूट गया हो या कुछ पूछना चाहते हों तो कृपया comment box में जरूर लिखें. तब तक के लिए-

“शुभकामनाएं आपके कामयाब और सफल खेती के लिए”

 धन्यवाद!

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