कृषि फार्मिंगजेट्रोफा करकस की खेती | Jatropha Curcas Cultivation in hindi

जेट्रोफा करकस की खेती | Jatropha Curcas Cultivation in hindi

बायोईंधन बनाने वाले जेट्रोफा करकस की खेती कैसे करें (Jatropha Curcas Cultivation/farming), जेट्रोफा की खेती क्यों है मुनाफे की खेती, पौधे कैसे तैयार करें, कहाँ से मिल सकते हैं, किस तरह की मिटटी में खेती की जा सकती है, कितने समय बाद फसल मुनाफा देने लगती है.

पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन (खनिज) सीमित है और उनका भंडार भी धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है, जैसे-जैसे पृथ्वी के संसाधनों में कमी आती जाएगी, जिसके कारण जहां एक तरफ उनकी कीमतें तो बढेंगी ही, वहीं दूसरी तरफ हमारे दैनिक उपयोग में लिए जाने वाले खनिज उत्पादों जैसे- Bio fuel, biodiesel आदि में कमी के कारण अनेकों समस्याओं का भी सामना करना भी संभावित हो सकता है.

इन संभावनाओं को देखते हुए हमें अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन विकल्पों का चयन करना जरूरी हो जाता है, जिससे हमें भविष्य में आने वाली संभावित समस्याओं का सामना करने में आसानी हो सके. इसी क्रम में आज हम आपके साथ एक ऐसे bio fuel farming (बायोईंधन की खेती) के बारे में विस्तृत जानकारी साझा करने जा रहे हैं, जिसे मुनाफे की खेती भी समझा जाता है-

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जेट्रोफा करकस की खेती से (Jatropha curcas cultivation) बायोईंधन उत्पाद (Bio fuel product) जैसे- biodiesel, ethanol bio fuel (CH3CH2OH) का निर्माण किया जाता है. ईंधन! जिसे वर्तमान दुनिया की धड़कन भी कहा जाता है और वाहनों द्वारा लम्बी दूरी के आवगमन के लिए जरूरी घटक भी है.

जेट्रोफा करकास एक ऐसा पौधा है, जिससे भविष्य में प्राप्त होने वाले ईंधन (Bio fuel production) के रूप में देखा जा रहा है, इसे bio fuel plant या biodiesel plant भी कहा जाता है, साथ ही Bio fuel production करने के कारण जेट्रोफा करकस की खेती या फसल को biodiesel crops के नाम से भी जाना जाता है.

जैविक स्रोतों से प्राप्त तथा जीवाश्म ईंधन के समतुल्य बायोईंधन (bio fuel), जिसे परम्परागत (बाजार में मौजूद) वाहनों के इंजनों को बिना परिवर्तित किये ही उपयोग में लिया जा सकता है और वर्तमान में आंशिक रूप से लिया भी जा रहा है।

जेट्रोफा करकास, जिसे हमारे देश भारत में कई नामों से जैसे- रतनजोत/रत्नज्योत, बाग़भेरण्ड, भगेरण्डा, जंगली अरंड या अरण्डी के नाम से भी जाना अथवा पहचाना जाता है.

जेट्रोफा करकस की खेती का महत्व-

असल में जेट्रोफा करकस या रतनजोत के पौधे का उपयोग भारत में प्राचीन काल से कई तरह के उपयोग में लिया जाता रहा है और आज जेट्रोफा की खेती- जैव ईंधन (bio fuel), औषधि (medicine), जैविक खाद (organic compost), रंग बनाने में (natural colors production), भूमि सूधार, भूमि कटाव आदि को रोकने में, खेत की मेड़ों पर व बाड़ के रूप में, एवं रोजगार की संभावनाओं को बढ़ानें में उपयोगी साबित हुआ है।

  • यह उच्चकोटि के बायोईंधन का स्रोत भी है जिसमें गैर विषाक्त, कम धुएँ वाला एवं पेट्रो-डीजल सी समरूपता होती है।
  • जेट्रोफा या रतनजोत पौधों के बीजों से प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा में बहुत अधिक होता है (लगभग 25 से 40% तक)।
  • यह तेल बिना शोधन (रिफाइन) किये हुए भी ईंधन (जैविक ईंधन-biofuel) के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • जेट्रोफा का तेल जलाने पर धुआंरहित (smokeless) स्वच्छ लौ पैदा करता है।
  • रोपण के दूसरे वर्ष से जेट्रोफा का पौधा फल देना शुरू कर देता है।
  • जेट्रोफा के पेड़ व पत्तियों को जानवर खाना पसंद नहीं करते।
  • कीटाणुओं का न के बराबर ही आक्रमण होता है।
  • किसी भी तरह की भूमि/मिट्टी में इसकी उपज की जा सकती है। ऊसर भूमि/मिट्टी में भी जेट्रोफा का पौधा अच्छे से पनप सकता है और ऊसर भूमि/मिट्टी को उपजाऊ भी बनाता है।
  • कठिन से कठिन परिस्थितियां भी जेट्रोफा या जंगली अरंड (wild castor) के लिए कोई खास समस्या नहीं है।
  • जेट्रोफा या रतनजोत का पौधा कई औषधीय लाभ से संयुक्त होता है। इसके बीज से तेल व इसके वृक्ष के कई भागों से दवाओं का निर्माण किया जाता है, जो कि व्यवसायिक दृष्टि से बड़े लाभ को इंगित करता है।
  • भूमि/मिट्टी क्षरण को रोकने में सहायक होता है।
  • जंगली अरंड या जटरोफा करकस की खेती (Jatropha Curcas Cultivation) के लिए किसान या उद्यमी का शिक्षित या अशिक्षित होना कोई जरूरी नहीं है, साथ ही जंगली अरंड का कोई भी प्रतिस्पर्धी नहीं है।

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जेट्रोफा करकस खेती के लिए स्थान का चुनाव-

जेट्रोफा करकस की खेती के लिए आपको या किसी भी किसान/उद्यमी को ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए जो अन्य फसल क्षेत्रों से कम से कम 3 से 05 मीटर दूर हो, साथ ही इसके खेत के चारों ओर बाड़ को लगाना जरूरी है क्योंकि जेट्रोफा एक विषैला वृक्ष (toxic plant) होता है।

मवेशी, पशुधन और बच्चों की सुरक्षा के लिए चारों तरफ से जेट्रोफा के खेत को बाड़ से सुरक्षित किया जाना अनिवार्य है। साथ ही आपका चिन्हित स्थान ऐसा होना चाहिए जहां जल का जमाव नहीं हो। मसनल यदि वर्षा आदि होती है तो उसका पानी आपके चिन्हित स्थान पर रुकना नहीं चाहिए।

जेट्रोफा करकस खेती के लिए मिट्टी का चुनाव-

जेट्रोफा की खेती कहीं भी और लगभग हर तरह की मिट्टी (सिर्फ रेत को छोड़कर, हालांकि रेत में पनप सकता है लेकिन अच्छी उपज नहीं मिल पाती) में आसानी से की जा सकती है। जेट्रोफा करकस की खेती (jatropha Curcas ki kheti) के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी बलुई दोमट व दोमट मिट्टी मानी जाती है। जटरोफा या जेट्रोफा की बेहतर उपज के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखना प्राथमिक चरण है।

जेट्रोफा करकस पौधा कहां से लें-

जेट्रोफा या रतनजोत की खेती शुरू करने के लिए जेट्रोफा का पौधा नर्सरीयों से मिल सकता है। मौलिक तौर पर आम साधारण नर्सरियों में जेट्रोफा के पौधे का मिलना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन यदि आप नर्सरीयों से इस पौधे की मांग करते हैं तो वे इस पौधे को आपको जल्द ही उपलब्ध करवा देंगे।

आप इस पौधे को स्वयं भी अंकुरित (Germinate) कर सकते हैं। इसके लिए कम्पोस्ट खाद (वर्मी कम्पोस्ट, कोकोपीट), साधारण मिट्टी, और रेत का अनुपात 1:1:1 लेकर मिश्रण तैयार कर लें। मिश्रण तैयार हो जाने के 01 दिन बाद ही बीजों का रोपण करें। जेट्रोफा कराकस या रतनजोत के बीज आपको अपने क्षेत्रीय सहकारी बीज वितरण केंद्र से मिल जाएंगे।

जेट्रोफा के पौधे को कलम काटकर भी लगाया जा सकता है, कलम काटने के लिए रतनजोत के पौधा कम से कम 20 इंच ऊंचा होना चाहिए, साथ ही कलम बनाने के लिए ऐसे पौधे का चुनाव करना चाहिए जो पूरी तरह से स्वस्थ हो और जिसमें कई आँखों (नोड) वाली निचली टहनियाँ हो उसे ही चुने। इन कलमों की रोपाई सीधे खेत में भी की जा सकती है.

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जेट्रोफा करकस की बुवाई समय-

रतनजोत या जेट्रोफा करकास की खेती शुरू करने के लिए इसके पौधों की बुवाई (बीज से अंकुरित करने के लिए) मार्च से अप्रैल माह में की जाती है, जहां रतनजोत के पौधा को जुलाई से अगस्त माह तक प्राथमिक चरण में विकसित किया जाता है।

प्राथमिक चरण में विकसित होने के बाद जटरोफा कराकस के पौधे खेत या चिन्हित स्थान पर लगाए जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। जिसे जुलाई माह से सितंबर माह के बीच चिन्हित स्थान पर रोपा जाता है। रोपने से पूर्व खाद व मिट्टी के अनुपात को जरूर संतुलित कर लें, जिसे ऊपर बताया गया है।

जेट्रोफा करकस की रोपण विधि-

  • रोपाई के लिए पौधों को एक सीधी लाइन (पंक्ति) में मेड़ (उभार) बनाकर ही लगाना चाहिए, साथ एक मेड़ से दूसरी मेड़ के बीच की दूरी आधा मीटर होनी चाहिए।
  • रोपाई के लिए एक पौधे से दूसरे पौधे की रोपाई के बीच कम से कम 2X2 फुट की दूरी का होना जरूरी है। शुष्क क्षेत्रों में यह दूरी 1X1 फुट भी रखी जा सकती है।

जेट्रोफा करकस के रोग व कीट रोधन-

जटरोफा या रतनजोत के पौधे में मुख्य तौर पर 02 तरह के रोग दिखाई देते या पाए जाते हैं-

  1. जड़ सड़न व
  2. तना बिगलन

जड़ों में सड़न व तना बिलगन की रोकथाम के लिए थाइरेम, बेबिस्टीन तथा वाइटावेक्स दवाओं के आनुपातिक (1:1:1) मिश्रण को बीज में मिलाकर ही बोयें। प्रति किलो बीज के अनुसार यह अनुपात मात्रा 03 ग्राम हो सकती है। यदि पौधे या वृक्ष की पत्तियां असामान्य पीली रंग की हो रही हैं तो इसका मतलब है कि पौधे या वृक्ष के पास जल जमाव हो रहा है, इसका निपटान करें।

जटरोफा या रतनजोत के पौधों में कटूवा (सूंडी) तने को काटने वाला कीट सबसे अधिक प्रभावित करता है। इसके उपचार के लिए Lindane या Folidol आदि दवाओं के छिड़काव से नियंत्रण किया जा सकता है। माइट (mites) के प्रकोप से बचाव के लिए 01 मिली मेटासिस्टॉक्स (metasystox) दवा को कम से कम 01 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

जेट्रोफा करकस फसल की सिंचाई-

जटरोफा की उच्च गुणवत्ता फसल प्राप्त करने के लिए एक साल में कम से कम 02 बार मार्च से मई माह में सिचाई की जाती है। वही यदि यह फसल शुष्क क्षेत्रों में पैदा की जा रही है तो कम से कम 03 बार मार्च से जून माह में सिचाई की जा सकती है।

साथ ही सिचाई से पहले व खेत सूखने के बाद गुड़ाई करने के साथ खाद आदि की पूर्ति करना एवं खर-पतवार का निदान/निपटान किया जाना भी जरूरी है।

जेट्रोफा करकस फसल तैयार अवधि-

अमूमन जंगली अरंड के वृक्षों/पौधों में वर्षा ऋतु में फूल आना शुरू हो जाते हैं, कुछ समय बाद ये फूल धीरे-धीरे हरे रंग के फल में बादल जाते हैं। दिसंबर से जनवरी महीने के बीच ये फूल पहले हरे रंग के और फिर पीले और अंत में काले रंग के होने लगते हैं।

फलों का ऊपरी रंग जब काला होने लगता है तब इन फलों को तोड़ा जा सकता है। जंगली अरंड या जटरोफा करकस की पहली फसल दूसरे वर्ष से मिलना शुरू हो जाती है। फसल का वर्षवार विवरण इस प्रकार है-

  • प्रथम वर्ष- कोई बीज उत्पादन नहीं
  • द्वितीय वर्ष- 500 से 01 किलो ग्राम/पेड़
  • तृतीय वर्ष- 01 से 2.50 किलो ग्राम/पेड़
  • चतुर्थ वर्ष- 2.50 से 04 किलो ग्राम/पेड़
  • आगे क्रमानुसार 06 से अधिकतम 6.5 किलोग्राम/पेड़ तक प्राप्त किया जा सकता है।

जंगली अरंड या जटरोफा का एक पेड़/वृक्ष लगभग 45 से 50 वर्षों तक फल दे सकता है। इसलिए इसकी बार-बार बुवाई आदि नहीं करनी पड़ती है।

कहां बेंचे-

जेट्रोफा या जंगली अरंड की खेती (wild castor cultivation) शुरू करने से पहले सबसे मुख्य प्रश्न होता है कि इसको कहां पर बेचा जा सकता है? या कौन सी कंपनियाँ या कारोबारी जटरोफा की फसल को खरीदते हैं?

तो इसका सबसे अच्छा और व्यापक समाधान है कि आप उन संस्थाओं/कंपनियों या कारोबारियों से संपर्क करें जो जटरोफा की फसल से बायोईंधन (bio fuel) बनाती/बनाते हों, इन संस्थाओं/कंपनियों या कारोबारियों को आप इंटरनेट के माध्यम से आसानी से खोज सकते हैं व संपर्क कर आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

भारत में कुल अभी तक कुल 36 कंपनियाँ या संस्थाएं बायोईंधन बनाने का काम कर रही हैं, इन संस्थाओं/कंपनियों की विस्तृत जानकारी के लिए PDF पीडीएफ़ देखें।

जेट्रोफा करकस के उपयोग-

  • जेट्रोफा के पौधे भूमि के क्षरण या कटाव को रोकने के काम में लिए जाते या जा सकते हैं
  • जट्रोफा पौधे/पेड़ की जड़ें जमीन से फास्फोरस जैसे रसायनों को सोखकर भूमि की उर्वरा क्षमता बढ़ाती हैं, साथ ही इसकी पुरानी, सूखती व झड़ती पत्तियां भी भूमि की उर्वरा-शक्ति को बढ़ाने का काम करती हैं।
  • प्राकृतिक रूप से कोई भी जानवर व कीड़े जंगली अरंड या सामान्य अरंड से दूर दूर ही रहते हैं। जिस कारण अधिकार किसान इसके पेड़ों को बाग के साथ खेतों की रक्षा के लिये किनारे की मेड़ों पर लगाना पसंद करते हैं।
  • इसके बीजों से तेल निकालने के बाद जो खली बचती है उसका उपयोग उच्च कोटि की जैविक खाद बनाने में प्रयोग किया जाता है यह खाद नाइट्रोजन आदि से भरपूर होती है।
  • इसका कच्चा तेल ग्लिसरीन व औषधि के रूप में किया जाता है।
  • तीव्रता से जलने के कारण इसके तेल को लालटेन आदि में भी उपयोग किया जा सकता है।
  • इसके तेल से बायोईंधन बनाया जा सकता है, यह बायोईंधन सबसे उच्च गुणवत्ता का होता है। व्यवसायिक तौर पर जेट्रोफा या रतनजोत की खेती एक वाणिज्यिक फसल में गिनी जाती है क्योंकि रतनजोत के पौधे के अधिकांश भाग से कई दवाओं का निर्माण किया जाता है।

जेट्रोफा करकस खेती की लागत (Jatropha Curcas cultivation cost)-

जेट्रोफा की खेती में जेट्रोफा के पेड़ को सुरक्षित रखने के लिए कोई खास देखभाल की जरूरत नहीं होती है, इसके 01 पेड़ पर प्रतिवर्ष अधिकतम लागत लगभग 8 से 10 रुपए आती है जो किसी भी किसान द्वारा आसानी से वहन की जा सकती है, साथ ही एक बार पेड़ रोपने के बाद अगले 40 से 50 साल तक वृक्ष फसल देता रहता है।

जेट्रोफा करकस फसल का मुनाफा-

फसल तैयार हो जाने के बाद सामान्य तौर जेट्रोफा या जंगली अरंड के बीज को होलसेल या थोक बाजार में 16 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से विक्रय किया जाता है (यह मूल्य फसल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है)। वही खुदरा बाजार में इन बीजों की कीमत लगभग 70 रुपए प्रति किलोग्राम से शुरू होकर 220 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो सकती है।

चूंकि जेट्रोफा की खेती B2B (बिजनेस टू बिजनेस) श्रेणी के अंतर्गत आता है, इसलिए Jatropha Curcas Seeds के अधिकतर खरीददार बायोईंधन/बायोफ्यूल के निर्माणकर्ता, कॉस्मेटिक निर्माणकर्ता, औषधि निर्माणकर्ता व रंग आदि के निर्माणकर्ता हो सकते हैं।

यदि आप इसकी खेती करते हैं तो इस बात की चिंता न के बराबर ही करें कि तैयार उत्पाद बिकेगा या नहीं। आपका तैयार उत्पाद हाथों हाथों बिक जाएगा। और यदि बिकने में कोई समस्या आ रही है तो ऊपर PDF लिस्ट दी गई है जिसमें उन निर्माणकर्ताओं की जानकारी दी गई है, जो इसके बीज को गुणवत्ता के आधार पर खरीद लेते हैं। आप संपर्क कर सकते हैं।

FAQ.

जेट्रोफा को हिंदी में क्या बोलते हैं?

हमारे देश भारत में जेट्रोफा को कई नामों से जैसे- रतनजोत/रत्नज्योत, बाग़भेरण्ड, भगेरण्डा, जंगली अरंड या अरण्डी के नाम से भी जाना अथवा पहचाना जाता है.

बायो डीजल पौधा कौन सा है?

सबसे अधिक मात्रा में बायोईंधन/बायो डीजल का निर्माण करने वाले पौधे का नाम जेट्रोफा कारकस है, जिसे रतनजोत या जंगली अरंड भी कहा जाता है.

रतनजोत और अरंडी के बीजों से क्या प्राप्त किया जाता है?

रतनजोत और अरंडी के बीजों से प्राकृतिक तेल और तेल निकल जाने के बाद खल प्राप्त होता है. दोनों ही by products को इस्तेमाल के आधार पर अलग-अलग उपयोग में लिया जाता है.

बायोडीजल फसल कौन कौन सी है?

बायोडीजल फसलों की श्रेणी में मुख्य रूप से यह फसल आती हैं-
1. जेट्रोफा कारकस
2. कपास
3. गन्ना और
4. आलू आदि

अंत में-

हमारा उद्देश्य उन इच्छुक उम्मीदवारों व किसानों को बेहतर से बेहतर जानकारी प्रदान करना है, जो बायोईंधन (Bio fuel) या जैविक ईंधन की खेती को करने के इच्छुक हैं और इस खेती से भविष्य में लगातार अच्छा मुनाफा कमाना/बनाना चाहते हैं.

नोट- किसी भी कृषि को शुरू करने से पहले रिसर्च करना एवं खपत का आंकलन अनिवार्य रूप से अवश्य करें. ऐसा करने से आपको कृषि में आने वाले जोखिम और दिक्कतों का सामना करने में आसानी हो जाएगी. साथ ही आपको अपनी फसल को उचित दर पर बेचने के लिए खरीददार भी आसानी से मिल जाएंगे.

आशा है आपको इस लेख जैविक ईंधन की खेती कैसे शुरू करें’  से बायोईंधन या जैविक ईंधन की खेती के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जरूर मिली होगी, साथ ही… यदि कुछ छूट गया हो या कुछ पूछना चाहते हों तो कृपया comment box में जरूर लिखें. तब तक के लिए-

“शुभकामनाएं आपकी कामयाब खेती और सफल भविष्य के लिए”

धन्यवाद!

जय हिंद! जय भारत!

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